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Friday, 19 October 2007

प्यार

"प्यार किया नही जाता, हो जाता है। जो करना पड़ता है वो प्यार नही कर्तव्य है। कर्तव्य निभाया जाता है,किन्तु प्यार मी यह बात नहीं। प्यार ह्रदय का सुललित भाव है, वह स्वतः रहता है। जब तक प्यार निभाना पड़ता है तब तक प्रिय दूर ही रहता है, उसकी स्मृति श्वांसों-प्राणों मै नही रमती। प्यार मिटने का नाम है, उसमे स्वयम का भान भी नहीं रह जाता , रहता है केवल प्रिय , वही रोम रोम का अधिष्ठाता बन जाता है । जब तक प्यार में पूर्ण समर्पण का भाव नहीं आ जाता , अपनापन का ध्यान रह जाता है तब तक प्यार कि बातें केवल बाते ही बन कर रह जाती है, उसका रुप जीवन में प्रत्यक्ष नहीं देखा जाता । "

प्यार ह्रदय का समर्पण है और वासना शरीर की भूख है । प्यार शरीर के माध्यम से दिखलाई देता है किन्तु है यह अशरीरी भाव । इसका जागरण जब होता तब हृदय सुमधुर भावो से सजने लगता है, स्व सुख की कामना मिटने लगती है एवं समर्पण के भाव जागृत होने लगते हैं। तब एक दिन ऐसा भी आ जाता है जब अपना कहने को कुछ भी नहीं रह जाता, रह जाता है केवल प्रियतम और उसी का जलवा सर्वत्र फ़ैल जाता है। वासना शरीर की अतृप्त आकांक्षा का नाम है। इसमे शरीर प्रधान रहता है, जो कुछ भी व्यक्ति करता है वह शरीर की भूख मिटाने के लिए करता है। इसे अपना कर व्यक्ति हर समय जलता रहता है जितना भी पाता है वह उसके लिये कम पड़ता है।
अतः उसका अंतर रोता रहता है। प्यार और वासना में समय विशेष के लिए बाहर से साम्यता दिखलाई पड़ सकती है किन्तु यथार्थ में कहीं साम्यता नहीं रहती, अर्थात जहाँ प्यार है वहाँ वासना नहीं और जहाँ वासना है वहाँ प्यार नहीं.

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